जिस माँ ने पाला था तुम्हे डूबकर पसीनो में ,
आज क्यों बाँट दिया जानबूझकर महीनो में ,
यह कुकर्म क्यों कर दिया भूलकर हसीनो में ,
नहीं सोचा था उसने ऐसा चाहकर सपनो में ,
की तुम्हे दुश्मन आयेंगे नजर अपनों में ,
केसे पाला था तुझे उसे यादकर दिनों में ,
छुपाया था तुझे अपना समझकर सीनों में ,
केसी हेवानियत बस गयी आज रचकर दिलो में ,
रोज पढता रहता हूँ , ऐसी घटना हर जिलो में ,
कुछ नहीं अंतर पढ़े लिखे और आदिवासी भीलों में ,
तुझे सुलाकर सूखे में , खुद सोयी गिलों में ,
फिर क्यों फ़ेक आते हो बहती हुई झीलों में ,
क्यों छोड़ आते हो डरावने खंडर किलों में ,
क्यों सुला देते हो जहरीले साप वाले बिलों में ,
इसलिए पागल हो जाती है रो -रोकर गिलों में ,
फिर भी काम करती रहती मजदूरी से मीलों में ,
पर तुम कैसे मस्त रहते हो फ़िल्मी रीलों में ,
माँ का घुटता दम रोज सवेरो में ,
खुद करते रज महल बसेरो में ,
छोड़ देते हो माँ को कच्चे झोपड़ो में ,
जहा रोज मरती है भुखमरी के थपेड़ो में ,
केसी हालत हो गयी माँ की गाँव शहरों में ,
दानव नजर आते है उसे तुम्हारे चेहरों में ,
बंद कर देते हो उसे जकड़कर संखिचो में ,
फिर टहलते हो मस्त होकर बगीचों में ,
मार देते हो उसे लटकाकर जंजीरों से ,
मन बहलाते हो केटरीना की तस्वीरो से ,
पर याद करो कितना मज़ा था माँ की दुलारों में ,
केसे मस्ती करते थे माँ की गोद भरी लहरों मे,
माँ डालती थी प्यार के रस खीरो में ,
कितना दम था माँ की ताशीरो में ,
जान तक फुक देती थी शहीद वीरो में ,
फिर क्यों बहा देते हो बुडापे में नहरों में,
क्या यही लिखा था माँ के नसीबो में ,
भूल जाओगे उसे मस्त रहकर रकीबो में,
पर याद रखना माँ नजर आएगी दर्पणों में ,
जिन्दगी न्योछावर थी उसकी तेरे अर्पंनो में ,
चारो धाम बसते है माँ के चरणों में ,
माँ का बखान मिलेगा पुराणों में ,
पुराणो मे ही नहीं मिलेगा सोपुराणों में ,
"जय माता दी "(रामावतार नागर ")